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Jun 14, 2013

कुछ सोच

जो सोचाथा वही सब हो रहा है 
फिर कदम क्यों  खामोश खड़े है । 
रास्ता मंजिल की तरफ का तो सोचा ही नहीं था । 
मंजिले तो पड़ाव होती है। 
ऐसे एक राह चलते एक राही ने मुझसे कहा था। 
 मेरे साथ चलो तुम्हे सूरज पर लेकर चलता हु । 
मेने उसे पागल समझा और चल पड़ा ,
अब समझा वो यहाँ तक आकर लौट चूका था । 
उसे मंजिल मिल गयी,
और मुझे  ख़ामोशी । 
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अभिजित १ ५ जून २  ० १ ३ 


पुरानी किताबे खोलने का एक डर हमेशा दिल में लगा रहता है । 

कही पन्ने बिखर ना जाये । 
वैसे ही कुछ छोटी छोटी यादो की किताबों का है । 
वैसे तो वो बिखरे हुए ही है । 
डर ये है ,
भूले हुए गिले फिरसे याद न आजाये । 
------------------------------अभिजित १ ३ जून २ ० १ ३

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